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विजयदशमी पर मोहन भागवत ने कहा- भारत में सत्ता परिवर्तन नहीं होगा

Mohan Bhagwat said there will be no change of power in India

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विजयादशमी पर नागपुर में शताब्दी वर्ष का कार्यक्रम आयोजित किया गया। सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने संबोधन में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव, तकनीक के विवेकपूर्ण उपयोग और नई पीढ़ी के नैतिक संस्कारों सहित कई विषयों पर विचार रखे।

‘वंदे मातरम्’ को स्वाभिमान से गाने में संकोच न हो

मोहन भागवत ने कहा कि बंग-भंग के विभाजनकारी षड्यंत्र को परास्त करने की प्रेरणा देने वाला ‘वंदे मातरम्’ आज भी राष्ट्रीय एकता का सशक्त प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह हमारा राष्ट्रगीत है और इसे स्वाभिमान के साथ, पूरे स्वर में गाने को लेकर किसी तरह का संकोच या विरोध नहीं होना चाहिए। भारत माता के प्रति यह भक्ति का भाव है।

संगठित समाज सद्भाव का पोषक

भागवत ने कहा कि संगठित और सशक्त हिंदू समाज की बात करना या उसके लिए काम करना सर्वपंथ समादर और राष्ट्रीय भावनात्मक एकता के विरुद्ध नहीं है। उनके अनुसार, हिंदू समाज का समावेशी स्वभाव संघ के कार्य को भावनात्मक एकता, सद्भाव और सदाचार का पोषक बनाता है। उन्होंने कैप्टन स्मित मच्छर का उल्लेख करते हुए कहा कि पीढ़ियों से मिले संस्कार ही व्यक्ति को दूसरों की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगाने की प्रेरणा देते हैं।

आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए

भागवत ने कहा कि भारत विकास की राह पर है, लेकिन विकास की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, इसलिए समस्याएं बनी रहेंगी। समस्याओं के चलते आंदोलन होते हैं और लोकतंत्र में उनका होना स्वाभाविक है। हालांकि, आंदोलनों का उद्देश्य समाधान खोजना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी गतिविधि से समाज में अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए।

वैश्विक अस्थिरता पर जताई चिंता

दुनिया में बढ़ती अस्थिरता का जिक्र करते हुए भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ‘रिजीम चेंज’ के नाम पर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हो रही गतिविधियों से विकसित देश भी प्रभावित हैं।

बलिदान और देश के प्रति निष्ठा

भागवत ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों और वीर सावरकर का देश के साथ संबंध किसी सौदे या अनुबंध पर आधारित नहीं था। यह भारत माता के प्रति बिना शर्त आत्मीयता और समर्पण का भाव था।

एआई के उपयोग में नैतिकता जरूरी

तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग पर भागवत ने कहा कि नैतिक अनुशासन के बिना इनका इस्तेमाल विनाशकारी हो सकता है। उन्होंने भारत की सनातन दृष्टि को विश्व के लिए संतुलित और समन्वयपूर्ण विकास का मार्ग बताया।

उन्होंने कहा कि भारत के विश्वगुरु बनने की जिम्मेदारी आने वाली पीढ़ी को संभालनी होगी। नई पीढ़ी को इसके लिए तैयार करना आवश्यक है। तकनीक और ज्ञान साधन मात्र हैं; उनका उपयोग किस दिशा में और कितने विवेक से किया जाता है, यही सबसे महत्वपूर्ण है।

ओटीटी मंचों पर अनुशासन की जरूरत

भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली जानकारी को उचित-अनुचित का विवेक किए बिना ग्रहण कर सकती है। इसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद कई देशों ने कुछ नियम और प्रतिबंध लागू किए हैं। उन्होंने कहा कि भारत में भी, विशेषकर ओटीटी मंचों के संबंध में, ऐसे अनुशासन की आवश्यकता महसूस की जा रही है और शासन-प्रशासन को इस पर विचार करना चाहिए।

नशे की लत गंभीर राष्ट्रीय समस्या

नशीली दवाओं की लत पर चिंता जताते हुए भागवत ने कहा कि विवेक के अभाव में दुनिया भर में युवा नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। उन्होंने इसे गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताते हुए कहा कि इसके समाधान के लिए शासन, प्रशासन और समाज को समय रहते मिलकर कदम उठाने होंगे। वर्तमान अभिभावक पीढ़ी का दायित्व है कि वह नई पीढ़ी में विवेक और नैतिक संस्कार विकसित करे।

वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भारत की भूमिका

भागवत ने कहा कि दुनिया विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने तथा विविधताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने की चुनौती से जूझ रही है। उनके अनुसार, बढ़ते भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय तनावों के बीच भारत की सनातन दृष्टि और सांस्कृतिक मूल्य वैश्विक समस्याओं के समाधान का मार्ग दिखा सकते हैं।

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